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छत्तीसगढ़ में निवेश को चाहिए बूस्टर डोज, उद्योगों के सामने जमीन का संकट

 रायपुर। छत्तीसगढ़ में पूंजीगत निवेश को बूस्टर डोज की जरूरत है। राज्य गठन के 23 साल में भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारों ने हजारों करोड़ रुपय...

 रायपुर। छत्तीसगढ़ में पूंजीगत निवेश को बूस्टर डोज की जरूरत है। राज्य गठन के 23 साल में भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारों ने हजारों करोड़ रुपये निवेश का दावा किया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, उत्तरप्रदेश की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में निवेश के लिए स्थानीय, राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को वह सुविधाएं नहीं मिल पा रही है, जिसकी दरकार है। प्रदेश के औद्योगिक व व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना है कि ज्यादा से ज्यादा निवेश का फायदा छत्तीगढ के आर्थिक विकास के साथ स्थानीय बाजार पर भी पड़ेगा। कंपनियों के आने से रोजगार में वृद्धि होगी। इससे नवाचार बढ़ेगा। वर्तमान में जो एमओयू हुए हैं, उनको जमीन,पर्यावरण अनुमति, सब्सिडी की सबसे बड़ी समस्या आ रही है।  निवेश को आकर्षित करने के लिए राज्य सरकार ने नई औद्योगिक नीति बनाई है, लेकिन नीतियों का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से नहीं हो पा रहा है। प्रदेश में सिंगल विंडो कारगर साबित नहीं हो रहा है। नान कोर सेक्टर के लिए पालिसी बनाई गई, लेकिन एक भी बड़ी कंपनियों ने यहां उत्पादन शुरू नहीं किया है। प्रदेश में ई-व्हीकल पालिसी के अंतर्गत निवेश को और ज्यादा कारगर करने की आवश्यकता है। राज्य सरकार से मिली जानकारी के मुताबिक वर्तमान में 192 एमओयू प्रभावी हैं, जिसमें 94,810 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। इस निवेश से प्रदेश में 1.15 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। औद्योगिक संगठनों के प्रतिनिधियों के मुताबिक उद्योग को जमीन उपलब्धता में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। रायपुर, दुर्ग-भिलाई, बिलाासपुर, रायगढ़, कोरबा, महासमुंद, बस्तर, सरगुजा आदि जिलों में जमीन अधिग्रहण में जनसुनवाई की फाइलें उद्योग विभाग से लेकर जिला मुख्यालयों में लंबित है। ग्रामीण क्षेत्रों में विरोध की वजह से भी सरकारी जमीन का अधिग्रहण अटका है। 70 प्रतिशत सेे अधिक एमओयू में उत्पादन शुरू नहीं होने की एक बड़ी वजह यह भी हैं। औद्योगिक नीति 2019-2024 मेें वर्तमान उद्याोग के विस्तार में स्टाम्प ड्यूटी में छूट देने का निर्णय लिया गया था,लेकिन यह नोटिफिकेशन अटका हुआ है। नोटिफिकेन नहीं होने की वजह से उद्योग समूहों को योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

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